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आतंकवाद: मानवता का कैंसर — कब तक बहता रहेगा यह ज़हर?


नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर दहशत के साए में आ गई है। 1990 के दशक और 2000–10 के उन खौफनाक दिनों की यादें ताज़ा हो गईं, जब धमाकों और आतंक की ख़बरें दिल्ली की पहचान बनती जा रही थीं। 10 नवंबर को लाल क़िला मेट्रो स्टेशन के पास हुए धमाके ने न सिर्फ़ शहर को हिला दिया, बल्कि पूरे देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर यह हमला अपने पूरे मंसूबे के साथ अंजाम तक पहुँच जाता, तो तबाही का पैमाना कितना भयावह होता।


जांच एजेंसियों और मीडिया के लिए यह तथ्य और भी चौंकाने वाला है कि राजधानी के उच्च-सुरक्षा क्षेत्र में एक पुरानी कार के विस्फोट में, जिसमें दर्जन भर से अधिक लोगों की जान गई और कई घायल हुए, उसी नेटवर्क द्वारा चार बड़े शहरों में एक साथ हमलों की योजना बनाई गई थी। बताया जा रहा है कि इस साजिश के तहत 32 वाहनों में विस्फोटक लगाए जाने थे।


जब जीवन रक्षक ही बन जाएं जीवन के दुश्मन
इस पूरे मामले में सबसे अधिक विचलित करने वाला पहलू यह है कि जिस युवक की कार में विस्फोट हुआ, वह पेशे से डॉक्टर था। इतना ही नहीं, इस नेटवर्क में कई डॉक्टर, विस्फोटक विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और उच्च शिक्षित पेशेवर युवाओं के शामिल होने की बात सामने आई है।


जो लोग जीवन बचाने की शपथ लेते हैं, यदि वही भय और मौत का सौदा करने लगें, तो यह न सिर्फ़ समाज बल्कि पूरी मानवता के लिए गहरा आघात है।
इन तथ्यों और दावों पर बहस हो सकती है, जांच एजेंसियां अपने निष्कर्ष तक पहुंचेंगी, लेकिन एक सत्य निर्विवाद है—आतंकवाद मानवता का कैंसर है। यह पहले इंसान की आत्मा को मारता है, फिर उसके शरीर को।


आतंकवाद और इस्लाम: सच क्या है?


सबसे बड़ा और ज़रूरी सवाल यह है कि आतंकवाद को बार-बार इस्लाम से जोड़ने की साज़िश क्यों रची जाती है? क्या इस्लाम में इसकी कोई गुंजाइश है?
पवित्र कुरान स्पष्ट करता है कि मानव समाज में विवाद और हिंसा की जड़ धार्मिक शिक्षाएं नहीं, बल्कि ईर्ष्या, स्वार्थ और सत्ता की लालसा है।
कुरान कहता है:


“मनुष्य एक ही समुदाय था, फिर मतभेद आपसी द्वेष और ईर्ष्या के कारण पैदा हुए।”
(सूरह अल-बकराह: 213)
इस्लाम की बुनियादी शिक्षा यह है कि समस्त मानव एक ही परिवार के सदस्य हैं। पैग़म्बर मोहम्मद (सल्ल.) ने फरमाया:
“सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति वह है, जो लोगों को सबसे अधिक लाभ पहुंचाए।”


फिर यह कैसे संभव है कि इस्लाम निर्दोषों की हत्या, बाज़ारों में बम विस्फोट और बच्चों-महिलाओं को निशाना बनाने की इजाज़त दे?


इस्लाम में हत्या और हिंसा का स्पष्ट निषेध
कुरान साफ़ शब्दों में कहता है:


“जिसने एक निर्दोष जान की हत्या की, उसने मानो पूरी मानवता की हत्या कर दी।”
(सूरह अल-माइदाह: 32)
युद्ध की स्थिति में भी इस्लाम सीमा लांघने की अनुमति नहीं देता। महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, उपासना स्थलों, फसलों और घरों को नुकसान पहुंचाने की सख़्त मनाही है।


“लड़ो उनसे जो तुमसे लड़ते हैं, लेकिन अत्याचार मत करो।”
(सूरह अल-बकराह: 190)


इस्लाम यह अधिकार किसी व्यक्ति या समूह को नहीं देता कि वह अपने स्तर पर युद्ध छेड़ दे। यह अधिकार केवल राज्य को है।


दया, क्षमा और न्याय का धर्म


फ़तह-ए-मक्का के अवसर पर, जब पैग़म्बर (सल्ल.) अपने दुश्मनों पर पूर्ण विजय पा चुके थे, तब बदले के बजाय उन्होंने कहा:


“जाओ, तुम सब आज़ाद हो।”


यही इस्लाम की आत्मा है—नफरत के जवाब में प्रेम, और हिंसा के सामने संयम।


इतिहास की चेतावनी और आज का सबक
बारहवीं सदी में, जब बग़दाद में सत्ता कमजोर थी और समाज हिंसा से जूझ रहा था, महान सूफ़ी संत शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी (रह.) ने चेतावनी दी थी.


“न अत्याचारी बनो, न अत्याचार का समर्थन करने वाले बनो। यदि मजबूर हो, तो अत्याचार सह लो, लेकिन अत्याचारी मत बनो।”

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