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रिम्स जमीन घोटाला: झारखंड हाईकोर्ट ने ACB जांच का दिया आदेश, CBI जांच फिलहाल टली

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) की अधिग्रहित भूमि पर हुए अवैध निर्माण मामले में बड़ा और कड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस पूरे प्रकरण की आपराधिक जांच एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) से कराने का निर्देश दिया है। साथ ही दोषी सरकारी, नगर निगम और नियामक अधिकारियों की भूमिका की जांच के आदेश दिए गए हैं।हालांकि अदालत ने माना कि मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई जांच भी उचित हो सकती थी, लेकिन इस चरण में राज्य पुलिस और ACB को प्राथमिकी दर्ज कर विस्तृत जांच करने का निर्देश दिया गया है।

1964–65 में अधिग्रहित भूमि पर अवैध कब्जा

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि वर्ष 1964–65 में रिम्स अस्पताल, छात्रावास और अन्य चिकित्सा सुविधाओं के निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण किया गया था। भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत मुआवजा भुगतान के बाद यह भूमि पूर्ण रूप से राज्य सरकार में निहित हो चुकी थी।

इसके बावजूद वर्षों तक इस भूमि पर अवैध रजिस्ट्रेशन, म्यूटेशन, लगान रसीद, गैर-अतिक्रमण प्रमाणपत्र, भवन नक्शा स्वीकृति और यहां तक कि रेरा (RERA) की मंजूरी तक दी जाती रही, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर निजी निर्माण खड़े हो गए।

पीआईएल के बाद सामने आया अतिक्रमण

यह मामला वर्ष 2018 से लंबित जनहित याचिका (PIL) के दौरान उजागर हुआ। हाईकोर्ट के निर्देश पर झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (JHALSA) की सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना द्वारा की गई जांच में रिम्स परिसर के भीतर लगभग 7 एकड़ भूमि पर अतिक्रमण पाए जाने की पुष्टि हुई।

जांच रिपोर्ट के अनुसार रिम्स परिसर में मंदिर, दुकानें, बहुमंजिला इमारतें, अपार्टमेंट, झोपड़ियां, पार्क और व्यावसायिक प्रतिष्ठान अवैध रूप से बनाए गए थे। कोर्ट ने कहा कि इससे अस्पताल की सेवाएं प्रभावित हुईं, स्वच्छता और सुरक्षा पर खतरा पैदा हुआ और विशेष रूप से गर्ल्स हॉस्टल के आसपास चोरी व छेड़छाड़ की घटनाएं सामने आईं।

72 घंटे में अतिक्रमण हटाने का आदेश

हाईकोर्ट ने 3 दिसंबर को अतिक्रमण हटाने का आदेश देते हुए 72 घंटे के भीतर परिसर खाली कराने का निर्देश दिया था। जिला प्रशासन और पुलिस को कार्रवाई के लिए अधिकृत किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिम्स जैसी वैधानिक चिकित्सा संस्था की अधिग्रहित भूमि पर किसी भी प्रकार का निजी स्वामित्व स्वीकार्य नहीं है।

मुआवजा मिलेगा, लेकिन सरकारी खजाने से नहीं

अदालत ने कहा कि जिन लोगों की इमारतें ध्वस्त की गई हैं, उन्हें मुआवजा दिए जाने का प्रावधान हो सकता है, लेकिन यह राशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि दोषी अधिकारियों और बिल्डरों से वसूली जाएगी। अदालत ने दो टूक कहा कि भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही का बोझ जनता पर नहीं डाला जा सकता।

बैंक और रिम्स प्रशासन की भूमिका पर सवाल

कोर्ट ने बैंकों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए, जिन्होंने बिना समुचित जांच के सरकारी भूमि पर बने भवनों को गिरवी रखकर ऋण स्वीकृत कर दिए। इसके अलावा रिम्स प्रशासन, नगर निगम और योजना प्राधिकरण की निष्क्रियता को भी कठघरे में खड़ा किया गया। बैंकों को अपने स्तर पर आंतरिक जांच के निर्देश दिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार

हाईकोर्ट के आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 17 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। हालांकि याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट में अपनी दलीलें रखने की छूट दी गई है।

6 जनवरी 2026 को अगली सुनवाई

मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी 2026 को होगी। कोर्ट ने संबंधित विभागों को सभी मूल अभिलेख वापस करने का निर्देश दिया है।

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