
धनबाद। जिस धनबाद को देश कोयलांचल के नाम से जानता है, आज वहीं कोयले की काली कमाई खुलेआम सिस्टम को ठेंगा दिखा रही है। हालात ऐसे हैं कि प्रशासनिक दफ्तरों से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही अवैध कोयला कारोबार दिन–दहाड़े फल-फूल रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अब तक सिर्फ खानापूर्ति ही देखने को मिली है।
शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक, रेलवे साइडिंग, बंद पड़ी खदानें, आउटसोर्सिंग एरिया और नदी किनारे बने अवैध डिपो—हर जगह कोयले की अवैध ढुलाई और भंडारण जारी है। सवाल यह है कि जब सब कुछ सबको दिख रहा है, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं?
रात के अंधेरे में नहीं, दिन के उजाले में खेलसूत्रों के अनुसार, धनबाद जिले के कई थाना क्षेत्रों में कोयले की अवैध ढुलाई अब छिपकर नहीं, बल्कि बेखौफ तरीके से हो रही है।
ट्रैक्टर, हाईवा और छोटे ट्रकों से कोयला खुलेआम सड़कों पर दौड़ रहा है। कई जगहों पर स्थानीय लोग बताते हैं कि पुलिस गश्ती के समय वाहन कुछ देर के लिए रुकते हैं, फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है।
लोगों का कहना है कि यह खेल नया नहीं है, बल्कि वर्षों से चल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इसका दायरा और हिम्मत दोनों बढ़ चुके हैं।
सूत्रों का दावा: नीचे से ऊपर तक ‘सेटिंग
कोयला माफिया इतना निडर कैसे है? इसका जवाब खुद सिस्टम की खामियों में छुपा है। जानकार बताते हैं कि अवैध कारोबार बिना संरक्षण के संभव नहीं। नीचे से लेकर ऊपर तक “सेटिंग” का खेल चलता है।
सूत्र यह भी दावा करते हैं कि कुछ मामलों में छापेमारी से पहले ही सूचना लीक हो जाती है, जिससे माफिया सतर्क हो जाते हैं।
पर्यावरण और जान-माल दोनों पर खतराअवैध खनन और भंडारण से सिर्फ सरकार को राजस्व का नुकसान नहीं हो रहा, बल्कि आम लोगों की जान भी खतरे में है। कई इलाकों में अवैध खदानों के धंसने की घटनाएं हो चुकी हैं। प्रदूषण, भू-धंसान और आग लगने जैसी घटनाएं आम हो चुकी हैं, लेकिन जिम्मेदारी तय करने वाला कोई नहीं।
कागजों में कार्रवाई, जमीन पर सन्नाटा
जब भी सवाल उठता है, प्रशासन की ओर से यही जवाब आता है—“जांच चल रही है”, “कार्रवाई की गई है”, “छापेमारी हुई है।”लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि कुछ गाड़ियों की जब्ती और दो–चार छोटे कारोबारियों की गिरफ्तारी के अलावा बड़े चेहरे अब भी कानून की पहुंच से बाहर हैं।
सबसे बड़ा सवाल
क्या धनबाद में कोयले का अवैध कारोबार प्रशासन की नाकामी है, या फिर मौन सहमति?अगर सब कुछ जानकारी में है, तो अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
