संजीत यादव
रांची: झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में कुड़मी समुदाय ने आदिवासी दर्जे की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया है। समुदाय के नेताओं ने 20 सितंबर को रेल रोको और सड़क मार्ग जाम करने का एलान किया है। इस दौरान तीनों राज्यों में रेल और सड़क यातायात बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। कुड़मी समुदाय लंबे समय से आदिवासी दर्जा बहाल करने की मांग करता आ रहा है। आंदोलनकारियों के अनुसार आज़ादी के शुरुआती दौर में उन्हें आदिवासी की श्रेणी में रखा गया था, लेकिन बाद में सूची से हटा दिया गया। अब वे पुनः आदिवासी दर्जे की बहाली चाहते हैं।
इस बार ज्यादा पुख्ता तैयारी
पिछले आंदोलनों की अपेक्षा इस बार कुड़मी संगठनों की तैयारी और मजबूत है। 2023 में हुए आंदोलन में मुरी, गोमो आदि स्टेशनों में हंगामा हुआ था। नौ ट्रेनें रद और आठ डायवर्ट की गई थी। 2022 में बंगाल के पुरुलिया और झारग्राम में रेल रोकी गई। कोलकाता हाई कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित किया था। इन घटनाओं से रेल राजस्व को करोड़ों का नुकसान हुआ था। आदिवासी रिसर्च इंस्टीट्यूट (टीआरआई) अपनी रिपोर्ट में कुड़मी की जनजातीय पृष्ठभूमि का मानने से पहले ही इनकार कर चुका है।
आंदोलन का माहौल
रांची, पुरुलिया, झाड़ग्राम, चाकुलिया, घाटशिला से लेकर ओडिशा के मयूरभंज तक, कुड़मी समाज के लोग तिरंगा और अपने पारंपरिक झंडे के साथ ट्रैक और सड़क पर उतरने की योजना बना रहे हैं।
• जगह-जगह “कुड़मी को आदिवासी दर्जा दो” के नारे लगाए जा रहे हैं।
• युवाओं में खासा जोश है और सोशल मीडिया पर भी यह अभियान जोर पकड़ चुका है।
• महिलाएं और ग्रामीण भी आंदोलन में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं।
आंदोलनकारियों की मांग
कुड़मी समाज का कहना है कि आज़ादी के शुरुआती दौर में वे आदिवासी सूची में शामिल थे, लेकिन बाद में बाहर कर दिया गया।एक आंदोलनकारी नेता ने कहा—“हमारा इतिहास, परंपरा और जीवनशैली आदिवासी समुदाय जैसी है। सरकार ने हमें जबरन सूची से बाहर किया। जब तक आदिवासी दर्जा नहीं मिलेगा, यह आंदोलन रुकेगा नहीं।”कुड़मी नेताओं का कहना है कि यह दर्जा न मिलने से शिक्षा, नौकरी और आरक्षण में उनके हक का हनन हो रहा है। आंदोलन के अगुआ शीतल ओहदार के मुताबिक इस बार अभियान को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए संदेश भेजे जा रहे हैं और बड़े पैमाने पर लोगों से आंदोलन में शामिल होने को कहा गया है। यह न केवल सामाजिक न्याय की मांग है, बल्कि समुदाय की पहचान की लड़ाई भी है। 20 सितंबर से रेल टेका (रेल रोको) और डहर छेका (रास्ता जाम) का एलान किया गया है। यह अनिश्चितकालीन आंदोलन है।
पूर्व में भी हुए हैं ऐसे आंदोलन
पूर्व में ऐसे आंदोलन के दौरान झारखंड के मुरी, गोमो, नीमडीह, घाघरा, हंसडीहा, छोटा गम्हरिया, डुमरी, गंजिया बराज आदि स्थानों पर रेलवे स्टेशनों पर धरना और ब्लाक किया गया था। इसके अलावा बंगाल में खेमासुली, कस्तौर, पुरुलिया, झारग्राम और ओडिशा के विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर भी समुदाय के लोगों ने रेल पटरियों को जाम कर दिया था। कुल 100 से अधिक जगहों पर रेल को रोका गया था, जिससे सैकड़ों ट्रेनें प्रभावित हुई थी। इसके अलावा सीमावर्ती क्षेत्रों में हाइवे पर भी बुरा असर पड़ा था।
संभावित असर
• रेल पटरी पर धरना से दर्जनों ट्रेनों का संचालन प्रभावित हो सकता है।
• सड़क मार्ग जाम होने से आम जनता को भारी परेशानी होगी।
• तीनों राज्यों में व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ने की संभावना है।
प्रशासन अलर्ट
रेलवे और पुलिस-प्रशासन पूरी तरह चौकन्ना है। संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किए जाने की तैयारी है। रेलवे ने यात्रियों को गैर-जरूरी यात्रा टालने की अपील की है।
राजनीतिक असर
विशेषज्ञों का मानना है कि कुड़मी समाज की संख्या झारखंड और बंगाल के कई जिलों में निर्णायक है। आंदोलन का असर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव पर भी देखने को मिल सकता है।

