
रांची : झारखंड में 514 आदिवासी युवाओं को फर्जी नक्सली बताकर जबरन सरेंडर कराने के मामले में झारखंड हाई कोर्ट में सोमवार को सुनवाई हुई। यह जनहित याचिका झारखंड काउंसिल फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स की ओर से दायर की गई थी। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने की।
राज्य सरकार की ओर से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की गई, जिसे कोर्ट ने स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई नवंबर महीने में निर्धारित की है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजीव कुमार ने अदालत को बताया कि 514 आदिवासी युवाओं को सीआरपीएफ में नौकरी का झांसा देकर पहले उन्हें कथित तौर पर नक्सली घोषित किया गया और फिर औपचारिक रूप से सरेंडर कराया गया। इस पूरे मामले को एक “प्रचार अभियान” बताया गया, जिसमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर करोड़ों रुपये खर्च करवाने और केंद्रीय गृहमंत्री के समक्ष पुरस्कार पाने की मंशा का आरोप लगाया गया है।
पूर्ववर्ती सुनवाई में अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा था कि क्या इन युवाओं को रांची स्थित पुरानी जेल परिसर में प्रशिक्षण दिया गया था, और क्या इस प्रशिक्षण की कोई कानूनी वैधता थी।
याचिका में यह भी आरोप है कि इस कथित “सरेंडर ड्रामा” के जरिए राज्य के भोले-भाले आदिवासी युवाओं को रोजगार का झांसा देकर ठगा गया। याचिकाकर्ता ने इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है, जिसकी समीक्षा अगली सुनवाई में की जाएगी।


