कतरास :आजादी के 78 साल बाद भी बाघमारा विधानसभा क्षेत्र के बागड़ा पंचायत में एक छोटी सी मजबूत पुल की मांग अब तक पूरी नही हुई। वो पुल जो यहां के हजारों लोगों की जिंदगी को हर दिन खतरे से बचा सके। बागड़ा–बारकी के बीच बहने वाली जोरिया सिर्फ एक पानी की धारा नहीं, बल्कि ग्रामीणों की मजबूरी, दर्द और नेताओं की उदासीनता की कहानी है।
बारिश होते ही यही रास्ता जानलेवा नदी में बदल जाता है। स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चे जूते हाथ में लेकर पानी में उतरते हैं। कई बार बच्चे फिसल कर गिर जाते हैं, चोटिल हो जाते हैं। एक अभिभावक की आवाज आज भी गूंजती है पढ़ाई का रास्ता नहीं, मौत का डर पार करके स्कूल जाते हैं हमारे बच्चे।
बारकी गांव की 70 वर्षीय सफातन बीबी उसी कीचड़ भरे रास्ते पर फिसलकर बुरी तरह गिर पड़ी थीं। पैर टूट गया। महीनों से चल भी नहीं पा रही हैं। वे कांपती हुई आवाज में कहती है पुल नहीं है ,इसलिए हर दिन डर के सहारे जीना पड़ता है। ग्रामीणों ने बताया कि उनलोगों ने विधायक, सांसद, बीडीओ, और अधिकारियों तक गुहार लगाई। लेकिन जवाब हर बार वही “देखेंगे… चुनाव में बात करेंगे।”
लोगों का कहना है कि सिर्फ आश्वासन मिलता है, काम नहीं। लाचार ग्रामीणों ने पूर्व जिप सदस्य संतोष महतो के साथ मिलकर अपनी जेब से पैसा और अपनी मजदूरी लगाकर एक छोटी पुलिया बनाई थी।लेकिन अब वह भी जर्जर होकर टूटने की कगार पर है। आज जब ग्रामीण मीडिया के सामने आए, उनकी आंखों में दर्द भी था और गुस्सा भी। ग्रामीण बोले यह हमारी सबसे बड़ी मजबूरी है कि हमें मीडिया के सामने अपनी पीड़ा बतानी पड़ रही है।
आजादी के इतने साल बाद भी हम एक पुल के लिए संघर्ष कर रहे है यह शर्म की बात है। बागड़ा–बारकी के लोगों की यही उम्मीद है कि उनकी इस पुकार को इस बार सिर्फ सुना ही नहीं, समझा भी जाए।

