
रांची: आज देश मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जयंती मना रहा है। आज़ादी की लड़ाई के सबसे दूरदर्शी नेताओं में गिने जाने वाले मौलाना आज़ाद सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी या भारत के पहले शिक्षा मंत्री भर नहीं थे, बल्कि वे भारत की बहुलता, विविधता और राष्ट्रीय एकता के सबसे मजबूत और सुसंगत आवाज़ थे। उनका वह ऐतिहासिक कथन आज भी दिलों को छूता है कि “हर भारतीय, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, सबसे पहले एक भारतीय है।”
यह विचार उन्होंने तब रखा था जब देश सांप्रदायिक विभाजन की आग से गुज़र रहा था। लेकिन मौलाना आज़ाद ने देशवासियों को यह समझाने का प्रयास किया कि भारत की असली पहचान उसकी साझा सांस्कृतिक धरोहर और सह-अस्तित्व की परंपरा है। वे कहते थे कि धर्म व्यक्ति का निजी विश्वास है, लेकिन राष्ट्र नागरिकों की साझा पहचान।
मौलाना आज़ाद धार्मिक और सांस्कृतिक समझ के बेहद गहरे विद्वान थे। वे कुरआन की उस व्याख्या पर जोर देते थे, जिसमें धर्मों के मूल में इंसानियत, न्याय और करुणा जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को केंद्र में रखा गया है। उनके लिए हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग समुदाय नहीं, बल्कि एक साथ विकसित हुई साझा सभ्यता के दो प्रवाह थे।
उन्होंने तर्क दिया था कि सदियों का सह-निवास, भाषा, खान-पान, कला, संगीत और जीवन शैली ने दोनों समाजों को एक-दूसरे में ऐसे ढाला है कि यह संबंध केवल सामाजिक नहीं, भावनात्मक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन चुका है।
स्वतंत्रता के बाद जब विभाजन की त्रासदी ने देश को झकझोर दिया था, तब भी मौलाना आज़ाद ने हिम्मत नहीं हारी। एकीकृत और धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण के लिए वे दृढ़ता से खड़े रहे। भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में उनका योगदान आज भी हमारी आंखों के सामने खड़ा है। आईआईटी जैसी संस्थाओं की स्थापना, यूजीसी की नींव और शिक्षा को आधुनिक व वैज्ञानिक दिशा देने में उनकी भूमिका निर्णायक रही।
उनके लिए शिक्षा सिर्फ पढ़-लिख लेने का साधन नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील, जागरूक और समानता पर आधारित समाज निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम थी। मौलाना आज़ाद बार-बार कहते थे कि शिक्षक सिर्फ पढ़ाएँ नहीं, छात्रों में जिज्ञासा, नेतृत्व और नैतिकता की लौ जलाएँ, और खुद उनके सामने आदर्श बनकर खड़े रहें।
आज जब समाज में सांप्रदायिक तनाव और ध्रुवीकरण की आवाज़ें बढ़ती नज़र आती हैं, तब मौलाना आज़ाद की बातें हमें फिर याद दिलाती हैं कि भारत की असली शक्ति उसकी साझी संस्कृति, आपसी सम्मान और क़ौमी एकता में है। हम भिन्न हो सकते हैं, लेकिन हमारी राष्ट्रीय पहचान हमें एक सूत्र में बांधती है।
उनकी विरासत हमें यही सिखाती है कि भारत की आत्मा विभाजन में नहीं, बल्कि विविधता में एकता में बसती है।


