
संजीत यादव
मेदिनीनगर: झारखंड में नगर निकाय चुनाव की अधिसूचना भले अभी जारी नहीं हुई हो, लेकिन मेदिनीनगर नगर निगम का राजनीतिक तापमान लगातार चढ़ता जा रहा है। संभावित प्रत्याशियों ने अभी से ही जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिशें तेज कर दी हैं।
छठ महापर्व ने मानो इस बार की चुनावी जंग की शुरुआती घंटी बजा दी है। पर्व के मौके पर सभी दावेदारों ने पोस्टर-बैनर लगाने, प्रसाद वितरण और पूजा सामग्री बांटने के जरिये अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है। शहर के लगभग हर चौक-चौराहे, घाट और मुख्य सड़कों पर प्रत्याशियों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स नजर आ रहे हैं। स्थानीय लोग खुद कह रहे हैं, इतने पोस्टर तो पिछले पाँच साल में नहीं लगे, जितने इस बार छठ में लग गए हैं।
ध्रुवीकरण नहीं, विकास बनेगा असली मुद्दा
मेदिनीनगर के मतदाता इस बार पूरी तरह बदले हुए मूड में नजर आ रहे हैं। जनता का कहना है कि अब “ध्रुवीकरण या जात-पात नहीं, बल्कि विकास, सफाई और सड़क-जाम से मुक्ति” जैसे मुद्दे ही निर्णायक होंगे। लोग अब ऐसे जनप्रतिनिधियों को चाहते हैं जो काम करने वाला हो, न कि सिर्फ चुनावी समय में दिखने वाला चेहरा।
‘बाबा’ बनाम ‘बाबू’ की पुरानी जंग में इस बार नए खिलाड़ी
मेदिनीनगर की राजनीति में दो पारंपरिक गुट — ‘बाबा’ (ब्राह्मण) और ‘बाबू’ (राजपूत) — वर्षों से हावी रहे हैं।हालांकि, पिछली बार इस समीकरण को बैकवर्ड वर्ग की उम्मीदवार अरुणा शंकर ने तोड़ दिया था। अरुणा शंकर ने सबको चौंकाते हुए महापौर की कुर्सी जीत ली थी, जिससे “बाबा-बाबू” का दशकों पुराना वर्चस्व हिल गया था। इस बार भी मुकाबला तीन ध्रुवों में बंटा दिखाई दे रहा है —बाबा बनाम बाबू बनाम बैकवर्ड,लेकिन इस बार एक नया ‘वाइल्ड कार्ड’ भी मैदान में है मुस्लिम प्रत्याशी।
मुस्लिम वोट बैंक पर टिकी निगाहें
मेदिनीनगर नगर निगम क्षेत्र में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत काफी मजबूत माना जाता है। अनुमान है कि शहर के आधे से अधिक वार्डों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अब तक बाबा और बाबू गुटों को मुस्लिम समाज का समर्थन मिलता रहा है, लेकिन इस बार समीकरण बदलते दिख रहे हैं।
झामुमो के जिला उपाध्यक्ष सानू सिद्दीकी ने महापौर पद की दावेदारी के संकेत देकर हलचल मचा दी है। सानू सिद्दीकी मुस्लिम समाज के प्रभावशाली और लोकप्रिय चेहरे माने जाते हैं, खासकर 15 वार्डो से अधिक इलाकों में उनकी मजबूत पकड़ बताई जाती है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर सानू सिद्दीकी आधिकारिक रूप से मैदान में उतरते हैं, तो “बाबा” और “बाबू” दोनों खेमों की राह आसान नहीं रहने वाली।
‘बाबा कैंप’ में गुटबाजी, कई दावेदार
ब्राह्मण समाज के भीतर इस बार एकजुटता के बजाय गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है। संभावित उम्मीदवारों में दीपक तिवारी, धनंजय त्रिपाठी, सुनील तिवारी, निर्मला तिवारी और परशुराम ओझा जैसे नाम प्रमुख हैं। हर कोई खुद को जनता का असली प्रतिनिधि बताकर घर-घर प्रचार में जुटा है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर बाबा समाज एकजुट होकर एक ही प्रत्याशी उतारे, तो मुकाबले को एकतरफा किया जा सकता है। लेकिन अधिक उम्मीदवारों के उतरने से वोटों का बिखराव तय है।
‘बाबू’ खेमे में भी सिंहों की गरज
राजपूत समाज यानी “बाबू वर्ग” की राजनीति मेदिनीनगर में सदैव प्रभावशाली रही है। कभी यह सीट राज परिवार का गढ़ मानी जाती थी, लेकिन अब उस पहचान को वापस पाने की जंग छिड़ी है। इस वर्ग से प्रमुख नाम हैं ,सुरेंद्र सिंह और उनकी पुत्रवधू पूनम सिंह, जो अपने पुराने राजनीतिक आधार को पुनः जीवित करने की कोशिश में हैं। इसके अलावा मनोज सिंह, जो स्व. विधायक विदेश सिंह के भतीजे और पूर्व विधायक बिट्टू सिंह के चचेरे भाई हैं, मनोज सिंह नगर परिषद के उपाध्यक्ष पद पर रहते हुए अपनी पकड़ मजबूत की थी।मंगल सिंह और मनोज सिंह के बीच इस बार कड़ी टक्कर बताई जा रही है। बाबू समाज के भीतर “पुराने बनाम नए चेहरों” की खींचतान भी चर्चा में है। अगरबाबू समाज एकजुट होकर एक ही प्रत्याशी उतारे, तो मुकाबले में दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आएंगे।
बैकवर्ड समाज भी तैयार ‘किंग’ बनने को
बैकवर्ड वर्ग, जिसमें वैश्य और ओबीसी समुदाय आते हैं, इस बार खुद को “किंगमेकर” नहीं बल्कि “किंग” साबित करने के मूड में है। वर्तमान महापौर अरुणा शंकर फिर से सक्रिय हो गई हैं। उनके अलावा अविनाश देव, विधायक प्रतिनिधि ट्विंकल गुप्ता और जुगल किशोर जैसे नाम भी सुर्खियों में हैं। राजनीतिक गणित कहता है कि अगर बैकवर्ड वर्ग एकजुट रहा, तो चुनावी तस्वीर पूरी तरह पलट सकती है, क्योंकि इस वर्ग की हिस्सेदारी नगर निगम के लगभग हर वार्ड में है।
बिना सिंबल का चुनाव, पर दलों की दांव पेंच जारी
राज्य सरकार ने इस बार नगर निकाय चुनाव बिना पार्टी सिंबल के कराने का निर्णय लिया है। लेकिन हकीकत यह है कि सभी बड़े दल कांग्रेस, भाजपा, झामुमो और आजसू ने अपने समर्थित उम्मीदवारों को प्रॉक्सी के तौर पर मैदान में उतारने की तैयारी में हैं।
एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “सिंबल भले न हो, लेकिन प्रतिष्ठा दांव पर है। हर दल अपने चेहरे को जीतते देखना चाहता है।
मुस्लिम उम्मीदवार बिगाड़ सकता है पूरा खेल
अगर मुस्लिम समाज एकजुट होकर किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करता है, तो चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा। लेकिन अगर मुस्लिम वोट कई चेहरों में बंट गया, तो इसका सीधा फायदा बैकवर्ड वर्ग को मिल सकता है। फिलहाल सानू सिद्दीकी के अलावा कुछ युवा मुस्लिम चेहरे भी तैयारी में हैं, जिससे मुकाबला और रोचक होता जा रहा है।
60 साल पुरानी परंपरा अब बदलने की कगार पर
मेदिनीनगर की राजनीति में पिछले 60 वर्षों से “बाबा-बाबू” का ही बोलबाला रहा है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है ,युवा, महिलाएं और व्यापारी वर्ग खुलकर राजनीति में उतर रहे हैं। लोग जातीय या धार्मिक समीकरण से ऊपर उठकर अब सड़क, सफाई, जलजमाव और ट्रैफिक जाम जैसे मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।
राजनीतिक जनकारो के माने तो हैं कि अगर कोई उम्मीदवार जनता को ठोस विजन देगा, तो वह पुराने ढर्रे को तोड़कर मेदिनीनगर की राजनीति में नया अध्याय लिख सकता है। अब सवाल एक ही कौन बनेगा मेदिनीनगर की सरकार?
क्या एक बार फिर ‘बाबा-बाबू’ की परंपरागत जंग देखने को मिलेगी,या फिर सानू सिद्दीकी जैसे नए मुस्लिम चेहरे शहर की राजनीति में नई इबारत लिखेंगे?
जनता का मूड साफ है ,इस बार वोट भावनाओं पर नहीं, विकास पर पड़ेगा। अब देखना यह है कि मेदिनीनगर की सरकार किसके सिर सजेगी ,बाबा, बाबू, बैकवर्ड या फिर कोई नया चेहरा?

