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कंदराओं से विकास की राह तक: बिरहोर समुदाय की बदली तस्वीर

सरकारी योजनाओं से मिली बुनियादी सुविधाएं, फिर भी रोजगार और शिक्षा बनी चुनौती

कभी पहाड़ों की कंदराओं में जीवन बिताने वाला बिरहोर समुदाय अब धीरे-धीरे विकास की मुख्यधारा से जुड़ता नजर आ रहा है। किस्को प्रखंड क्षेत्र में बसे इस आदिम जनजाति के लोगों तक अब सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पहुंच रहा है, जिससे उनके जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

खरकी पंचायत की सेमरडीह बिरहोर कॉलोनी में करीब 35 परिवारों के लगभग 150 लोग, जबकि देवदरिया पंचायत के खरचा गांव में 6 परिवारों के 20 लोग निवास करते हैं। सभी परिवारों को विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है, जिससे उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।

🏠 बुनियादी सुविधाओं से बदली तस्वीर

गांव में अब बिजली, पानी, सड़क, शौचालय और आवास जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। अधिकांश परिवारों को बिरसा आवास योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के मकान मिले हैं।

हर घर तक बिजली पहुंच चुकी है, वहीं नल कनेक्शन के जरिए घर-घर पानी की आपूर्ति हो रही है। गांव में दो जलमीनार स्थापित हैं, जिनसे सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों तरह से जल आपूर्ति की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।

💼 रोजगार के प्रयास, पर चुनौतियां बरकरार

बिरहोर समुदाय का मुख्य पेशा पत्तल, रस्सी और झाड़ू बनाना है। एक रस्सी बेचने पर उन्हें करीब 40 रुपये की आमदनी होती है। रोजगार बढ़ाने के लिए गांव में दोना-पत्तल केंद्र भी खोला गया है, वहीं कृषि कार्य के लिए बीज और सामग्री देकर लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

इसके बावजूद ग्रामीणों का कहना है कि साल भर पर्याप्त रोजगार नहीं मिलने के कारण कई परिवारों को पलायन करना पड़ता है। उन्होंने सभी परिवारों को शत-प्रतिशत रोजगार उपलब्ध कराने की मांग की है।

🎓 शिक्षा अब भी बड़ी समस्या

विकास के बावजूद गांव में शिक्षा की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। गांव में विद्यालय नहीं होने के कारण बच्चों को पढ़ाई के लिए करीब 3 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। पहले मौजूद स्कूल को दूसरे गांव में मर्ज कर दिया गया है, और उसके भवन में अब दोना-पत्तल केंद्र संचालित हो रहा है।

📜 बसावट का इतिहास

सेमरडीह में वर्ष 1997 में बिरहोर समुदाय के लोगों को बसाया गया था। उस समय गुलाम बिरहोर, भैरो बिरहोर और गणेश बिरहोर जैसे लोगों ने यहां बसकर इस कॉलोनी की नींव रखी थी।

ग्रामीणों—लुकस बिरहोर, पुतरु बिरहोर, भैरव बिरहोर, जीतराम, जीवन, सिकंदर, रतिया बिरसई, प्रकाश और सोहराई—का कहना है कि अब गांव में अधिकांश बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी सुधार की आवश्यकता है।

👉 कुल मिलाकर, बिरहोर समुदाय के जीवन में विकास की रोशनी जरूर पहुंची है, लेकिन स्थायी रोजगार और बेहतर शिक्षा की दिशा में अभी लंबा सफर तय करना बाकी है।

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swatantraawaj desk

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