रांची। झारखंड की राजनीति में इस समय सबसे ज्यादा उथल-पुथल भाजपा के भीतर दिखाई दे रही है। नेतृत्व भले ही चुनावी जमीन तलाशने की कोशिशों में जुटा हो, पर पार्टी अंदरखाने छह फाड़ में बंटी हुई दिख रही है। झामुमो के एक ‘अकेला शेर’ को घेरने की जल्दबाज़ी में भाजपा ने अपने ही पांच-दरजे के ‘शेर’ घायल कर दिए — अब उन्हें मनाना शीर्ष नेतृत्व के लिए पहाड़ जैसा काम बन गया है।
पहला फाड़ — रघुवर दास
पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास झारखंड भाजपा की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में गिने जाते हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए उनके काम को आज भी एक बड़ा वर्ग याद करता है। केंद्र ने उन्हें ओडिशा का राज्यपाल बनाकर शांत करने की कोशिश की, मगर उन्होंने वह पद छोड़ फिर से झारखंड में सक्रिय राजनीति का बिगुल बजा दिया।
लेकिन हैरानी की बात यह कि इतनी बड़ी वापसी के बाद भी न उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व में जगह मिली, न प्रदेश अध्यक्ष का पद।
बाहरी तौर पर वे खुद को ‘भाजपा का सिपाही’ बताते हैं, मगर अंदरखाने नाराज़गी जोर पकड़ रही है।
दूसरा फाड़ — बाबूलाल मरांडी
झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और आदिवासी चेहरा बाबूलाल मरांडी को भाजपा ने कभी तारणहार के रूप में पेश किया था। अपनी पार्टी से 5–10 सीटें अकेले जीत कर लाने वाले मरांडी को भाजपा में विलय के बाद नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया गया।
लेकिन अचानक नेतृत्व ने उन्हें हटाकर आदित्य साहू को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया।
इसके बाद विधायक के. सिंह के तीखे बयान ने मरांडी की नाराज़गी को और भड़का दिया। आज भी झारखंड में विपक्ष की असली राजनीति अकेले मरांडी ही कर रहे हैं—पर वे भी अब ‘घायल शेर’ की तरह संघर्ष कर रहे हैं।
तीसरा फाड़ — अर्जुन मुंडा
अर्जुन मुंडा, जिनका प्रभाव झारखंड की राजनीति में हमेशा मजबूत माना गया है, आदित्य साहू को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से बेहद नाराज़ बताए जा रहे हैं।
अपने क्षेत्र में वे दबी आवाज़ में विरोध जता रहे हैं।
मुंडा गुट के नेता खुलकर असंतोष जता रहे हैं—और भाजपा नेतृत्व इस असंतोष की आग को शांत करने में नाकाम दिख रहा है।
चौथा फाड़ — मधु कूड़ा
मधु कूड़ा भी आदित्य साहू की नियुक्ति से नाखुश बताए जा रहे हैं।
उनकी इच्छा थी कि प्रदेश अध्यक्ष पद किसी आदिवासी नेता को मिले, जिससे भाजपा फिर से आदिवासी वोट बैंक में पैठ बना सके।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ—और अब कूड़ा अपने क्षेत्र में खुल कर विरोध जता रहे हैं।
पांचवा फाड़ — चंपई सोरेन
आदित्य साहू के चयन से सबसे ज्यादा अगर कोई आहत है, तो वह हैं चंपई सोरेन।
उनका और उनके समर्थकों का साफ मानना है कि आदिवासी बहुल झारखंड में भाजपा को एक आदिवासी चेहरा ही प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहिए था।
भाजपा कार्यालय में हुई बैठक के दौरान उनके चेहरे की उदासी और चुप्पी ने सब कुछ बयां कर दिया। अंदरखाने नाराज़गी गहरी है और भाजपा नेतृत्व इसे समझने में चूक गया है।
भाजपा के पांचों पूर्व मुख्यमंत्री एक साथ नाखुश—नेतृत्व की सबसे बड़ी चुनौती
भाजपा ने आदित्य साहू को अध्यक्ष बनाकर झारखंड में शक्ति संतुलन साधने की कोशिश जरूर की है, लेकिन इस फैसले ने पार्टी के पांचों पूर्व मुख्यमंत्रियों को एक साथ चोट पहुंचाई है।
सीपी सिंह के बयान—”अच्छा हुआ कि इस बार कोई आया-राम गया-राम को अध्यक्ष नहीं बनाया गया”—ने अंदरूनी आग में घी डालने का काम कर दिया।
क्या झारखंड में भाजपा फिर खड़ी हो पाएगी? झारखंड भाजपा ‘पांच फाड़’ में बंटी दिख रही है।
नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह इन घायल शेरों को एकजुट कर पाएगी?
या फिर झामुमो का ‘अकेला शेर’ — हेमंत सोरेन — एक बार फिर मैदान में तीर चलाकर भाजपा की राह को और कठिन कर देगा?


