
रांची। वाह रे झारखंड पुलिस! कभी कहा जाता है कि मालखाने से दारू चूहे पी गये, तो कभी अदालत में यह दलील दी जाती है कि 200 किलो गांजा चूहे खा गये।
अगर चूहे ही इतने पीने–खाने लगे हैं, तो फिर सवाल लाज़मी है हुज़ूर—
मालखाने में रखा क्या है और पहरा दे रहा कौन है?दारू भी गई, गांजा भी गया… कानून वहीं रह गया
राज्य के कई थानों के मालखाने पहले भी सवालों के घेरे में रहे हैं, जहां जब्त शराब “खुद-ब-खुद” गायब हो जाती है।
अब रांची के ओरमांझी थाना का मामला सामने आया है, जहां एनडीपीएस एक्ट के तहत जब्त किया गया गांजा अदालत में पेश होने से पहले ही “चूहों की दावत” बन गया।
क्या झारखंड के चूहे नशे के सौदागर बन चुके हैं?
या फिर हर बार जब जब्त माल गायब होता है, तो उसके पीछे कोई नया बहाना गढ़ लिया जाता है?
200 किलो गांजा—
न जला,
न नष्ट हुआ,
न ही नियमानुसार डिस्पोज़ हुआ,
बस अदालत को यह बता दिया गया कि “चूहे खा गये।”
200 किलो गांजा और करीब एक करोड़ का सच
ओरमांझी थाना में गांजा जब्त होने के बाद कड़ी निगरानी का दावा किया गया था।
लेकिन अदालत में पुलिस की ओर से जो कहानी पेश की गई, उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए।
करीब एक करोड़ रुपये कीमत का गांजा—
ताले तोड़कर नहीं गया,
कोई चोरी नहीं हुई,
बस चूहों के पेट में समा गया!
अगर यही सच्चाई है, तो क्या थानों के मालखाने में ताले नहीं, सिर्फ चूहे पलते हैं?
गवाह बोले अलग-अलग, कहानी बिखर गई
मामले की सुनवाई के दौरान हालात और भी चौंकाने वाले रहे।
• आरोपी को किसने पकड़ा— कोई स्पष्ट जवाब नहीं
• वाहन कहां रोका गया— इस पर भी चुप्पी
• इंजन और चेसिस नंबर— रिकॉर्ड में साफ नहीं
• जब्ती की प्रक्रिया— संदेह के घेरे में
जब सबूत ही भरोसेमंद न हों, तो अदालत के सामने विकल्प क्या बचता है?
नतीजा— आरोपी बरी, और उंगलियां पुलिस की कार्यप्रणाली पर।
शराब पीने वाले चूहे, गांजा खाने वाले चूहे!
आज अगर मालखाने से
दारू चूहे पीते हैं,
गांजा चूहे खाते हैं,
तो कल क्या होगा?
क्या हथियार चूहे चलाएंगे?
क्या फाइलें चूहे तैयार करेंगे?
और अदालत में गवाही भी
चूहे ही देंगे?
आख़िरी सवाल— सिस्टम से
यह खबर किसी एक आरोपी की नहीं है।
यह उस सिस्टम की कहानी है,
जहां जब्त माल गायब हो जाता है,
और जिम्मेदारी भी।
वाह रे झारखंड पुलिस!
अगर मालखाने में सब कुछ चूहे ही निपटा रहे हैं,
तो फिर कानून किसके भरोसे है?
और जनता आज भी पूछ रही है—
मालखाना सच में सबूतों का घर है,
या फिर बहानों का गोदाम?

