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माई लॉर्ड के नाम पर ब्रेक नहीं, थानेदार पर ब्रेक लग गया

संजीत यादव

रांची। रविवार की रात राजधानी रांची में कानून ने वर्दी पहन ली थी और सड़क पर उतर आया था। हेलमेट, कागज और नंबर प्लेट से कानून अपनी इज्जत बचाने की कोशिश कर रहा था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था… तभी एक स्कूटी आई और कानून की नब्ज़ अचानक तेज़ हो गई।

मामला कोतवाली थाना क्षेत्र के शहीद चौक का है। थाना प्रभारी आदिकांत महतो साहब ईमानदारी की पूरी बैटरी लगाकर वाहन जांच कर रहे थे। तभी एक जवान स्कूटी पर पहुंचे। जांच के लिए रोका गया तो ब्रेक नहीं लगाया गया, सीधा पहचान लगा दी गई—“हम VVIP के बॉडीगार्ड हैं।”

इतना सुनते ही चालान मशीन ने आत्मसमर्पण कर दिया। कानून ने हेलमेट उतारकर पूछा—“सर, अब हम लागू रहें या साइलेंट मोड में चले जाएं?” इसी सवाल पर थानेदार और जवान के बीच बहस शुरू हुई, जो चंद सेकंड में फुल HD से डायरेक्ट 4K विवाद में तब्दील हो गई।

इसके बाद जवान ने स्कूटी वहीं छोड़ी, मोबाइल निकाला और ऊपर फोन घुमा दिया। कॉल लगते ही पुलिस महकमे में सायरन नहीं, बल्कि ‘वीआईपी अलर्ट’ बज उठा। कुछ ही मिनटों में वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे—कानून समझाने के लिए नहीं, बल्कि पहचान समझने के लिए।

और फिर वह हुआ, जो सिस्टम में हमेशा होता है—एक घंटे के भीतर थानेदार साहब लाइन हाजिर।न जांच, न नोटिस, न सवाल—बस मौन आदेश: “कानून सबके लिए बराबर है, लेकिन कुछ लोगों के लिए ज़्यादा बराबर।”

सूत्र बताते हैं कि जिनके बॉडीगार्ड को रोका गया, वे कोई साधारण VVIP नहीं थे, बल्कि हाईकोर्ट के माननीय माई लॉर्ड थे। बॉडीगार्ड का रुकना मानो संविधान की अवमानना हो गई हो।

अब थाने के भीतर नई कानूनी परिभाषा गूंज रही है—आम आदमी रुकेगा तो चालान कटेगा,और पहचान वाली स्कूटी रुकेगी तो थानेदार कटेगा। फिलहाल कोतवाली थाना थानेदार-विहीन है, लेकिन व्यवस्था सबक से भरी हुई है।

अब सवाल यह नहीं कि गलती किसकी थी, सवाल यह है कि गलती पूछने की हिम्मत किसे थी?

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बॉडीगार्ड ने न सिर्फ बदतमीजी की, बल्कि ट्रांसफर की धमकी भी उसी आत्मविश्वास से दी, जैसे चालान की रसीद काटी जाती है। और अंत में, धमकी ने ही चालान काट दिया—थानेदार का।

अब आप ही बताइए, माई लॉर्ड—एक तरफ पुलिस जवान रात-दिन सड़क पर कानून की चौकीदारी करते हैं,और दूसरी तरफ जब VVIP, उनके परिजन या अंगरक्षक रोके जाते हैं, तो कानून को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

ऐसे में निष्पक्ष कानून व्यवस्था नहीं, बल्कि पहचान आधारित ट्रैफिक सिस्टम बनता जा रहा है।अंत में, जज साहब, माई लॉर्ड, बस इतना सा निवेदन—कृपया कानून को पहचान से छोटा मत कीजिए, क्योंकि जब कानून झुकता है, तो भरोसा खड़ा नहीं रह पाता।

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