रांची: झारखंड, बंगाल और ओडिशा में फैले कुड़मी समुदाय की आदिवासी दर्जा बहाली की पुरानी मांग अब नए चरण में पहुंच गई है। कुड़मी संगठनों ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी सूरत में आदिवासी संगठनों से टकराव नहीं चाहते। उनका कहना है कि संघर्ष केवल अपने ऐतिहासिक हक की बहाली के लिए है, न कि किसी दूसरे समुदाय के अधिकारों को छीनने के लिए।कुड़मी नेताओं के अनुसार, 1950 से पहले उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा प्राप्त था और अब उनकी लड़ाई उसी दर्जे को बहाल कराने की है। हाल ही में रांची, हजारीबाग, गिरिडीह, जमशेदपुर और बोकारो समेत कई जगहों पर रेल रोको आंदोलन हुआ, जिससे 55 से अधिक ट्रेनें प्रभावित हुईं। हालांकि अब कुड़मी संगठन चिंतित हैं कि आदिवासी संगठनों का विरोध इस आंदोलन को अनचाहे टकराव की ओर न ले जाए।
समन्वय की कोशिश तेज
कुड़मी संगठन लगातार आदिवासी संगठनों से संवाद की पहल कर रहे हैं। उनका कहना है कि दोनों समुदाय सदियों से साथ रहते आए हैं और भाईचारे को कोई आंच नहीं आनी चाहिए। “हमारा संघर्ष ऐतिहासिक दस्तावेजों पर आधारित है। किसी का हक छीनना हमारा उद्देश्य नहीं,” कुड़मी नेताओं का कहना है।झारखंड सरकार ने 2004 में कुड़मियों को एसटी सूची में शामिल करने की सिफारिश की थी। लेकिन आदिवासी संगठन इसे राजनीतिक साजिश मानते रहे हैं। कुड़मी नेता शीतल ओहदार का कहना है, “हमारा आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है। आदिवासी और कुड़मी समुदाय का आपसी भाईचारा ही हमारी असली ताकत है।”


