रांची: राजधानी के बिरसा मुंडा एयरपोर्ट का विस्तार वर्षों से जमीन विवाद में फंसा हुआ है। हैरानी की बात यह है कि जिस 303 एकड़ जमीन पर एयरपोर्ट को आगे बढ़ना था, उसका मुआवजा रैयतों को वर्षों पहले दे दिया गया, लेकिन आज तक जमीन का वास्तविक हस्तांतरण नहीं हो पाया है।
इस कारण एयरपोर्ट का विस्तार, आधुनिकीकरण और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाने की योजना ‘होल्ड’ पर है। जमीन विवाद सुलझाने के लिए तय महत्वपूर्ण बैठकें भी अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण टल चुकी हैं, जिससे प्रशासनिक उदासीनता साफ झलकती है।अब तक करीब 35 बैठकों के बावजूद नागर विमानन विभाग, जिला प्रशासन और एयरपोर्ट प्रबंधन के बीच कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। यह मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यशैली पर भी सवाल खड़ा करता है।–
-14 साल से अटका प्रोजेक्ट
2012-13: 303 एकड़ जमीन का अधिग्रहणमुआवजा
: रैयतों को भुगतान पूरायोजना
: 30 साल की लीज पर एयरपोर्ट को हस्तांतरण
2026: जमीन अब भी एयरपोर्ट के कब्जे से बाहर—अतिक्रमण बना बड़ी चुनौतीजमीन पर कब्जा नहीं मिलने के कारण अतिक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है।130 से अधिक मकान बन चुके हैं
मैरेज हॉल और धार्मिक संरचनाएं खड़ी हो गई हैंजमीन की खरीद-बिक्री भी जारी हैयह स्थिति भविष्य में विकास कार्यों को और महंगा और जटिल बना सकती है।—रनवे छोटा, उड़ान सीमितवर्तमान में एयरपोर्ट का रनवे लगभग 2700 मीटर है, जबकि करीब 900 मीटर विस्तार जरूरी है। जमीन के अभाव में यह विस्तार संभव नहीं हो पा रहा है, जिससे बड़े विमानों की लैंडिंग और लंबी दूरी की उड़ानों पर असर पड़ रहा है।–
-हर फ्लाइट में देरीपैरेलल टैक्सी ट्रैक (PTT) के अभाव में विमानों को रनवे से ही टैक्सी करना पड़ता है।हर उड़ान में 5–10 मिनट की देरीपीक ऑवर में संचालन प्रभावित—विकास की योजनाएं ठपजमीन विवाद के कारण कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं रुकी हुई हैं:आइसोलेशन वेकैट-टू लाइट सिस्टमपैरेलल टैक्सी ट्रैकटर्मिनल विस्तार
—इंटरनेशनल स्टेटस पर ब्रेकतकनीकी और पर्यावरणीय मानकों के लिहाज से एयरपोर्ट तैयार माना जा रहा है, लेकिन जमीन विवाद सबसे बड़ी बाधा है।निष्कर्ष:रांची एयरपोर्ट का विस्तार अब तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की परीक्षा बन चुका है। जब तक जमीन का मसला नहीं सुलझेगा, तब तक विकास की उड़ान कागजों तक ही सीमित रहेगी।
